गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

जागरूक जनता

रुचिका का मामला 1993 में भी मीडिया ने लोगो के सामने में लाया था. पर इन 19 सालो में जनता काफी बदल गयी , आज जिसतरह से जनता जागरूक हो कर राठौर का विरोध कर रही है ,आने वाले दिनों में लगता है कि हम सही दिशा की और बढ़ रहे है.
2006 से जनता के व्यहवार में जबरदस्त बदलाव आया है , जेस्सिका लाल मडर केस के बाद लोगो ने जिस तरह इसका विरोध किया किसी ने नहीं सोचा था की न्यायपालिका को एक बार पुनर्विचार करना पड़ेगा अपने ही किसी निर्णय पर . जो भी हो जनता में बहुत ताकत होती है , अगर वो जग जाये तो .

नए साल की शुभ कामनाओ के साथ , फिर मिले गे ( आस्ते बोछोर आबार...)
आप की
माधवी श्री

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

पत्रकार से बेहतर दिल्ली सरकार के बस ड्राईवर

दिल्ली सरकार के बस ड्राईवरओ की शुरुआती तन्खावह पन्द्रह हज़ार रुपये होती है , फिर उसमे कुछ सेनिओर या बड़े वाहन से जुड़ा ALLOWANCE अगर मिला दिया जाये तो कुल मिला कर उनकी तन्खाव बीस हज़ार हो जाती है .
पर हमारे मीडिया में एक पढ़े - लिखे पत्रकार की शुरुआती तन्खावह क्या होगी ज्यादा से ज्यादा ५- १० -१५ हज़ार. इससे ज्यादा तो बिलकुल नहीं.
तो हुए न दिल्ली सरकार के बस ड्राईवर पत्रकार से बेहतर.
तो आगे से दिल्ली सरकार के बस ड्राईवर बनियो पर पत्रकार न बनियो.

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

टेनिस खिलाडी रुचिका गिरहोत्रा की दोस्त अनुराधा के नाम

हरियाणा पुलिस के पूर्व डी.जी.पी एस. पी. एस. राठोर को सजा मिलने के ठीक घंटे भर बाद जमानत मिलजाना हमारे न्याय- व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था की जो दयनीय तस्वीर पेश करती है उससे भविष्य के प्रति हमारा शंकालु होना स्वाभिविक है. .राठोर को टेनिस खिलाडी रुचिका गिरहोत्रा से १२ अगस्त १९९० में अश्लील हरकतों और आत्महत्या के लिये उकसाने के आरोप में ६ महीने की सजा हुई है. उस समय रुचिका गिरहोत्रा की उम्र केवल १४ साल थी.इंसाफ न मिलने से और घरवालो की लगातार परेशानी से परेशान होकर रुचिका गिरहोत्रा ने २९ दिसंबर १९९३ को मोत को गले लगा लिया था. ऊपर से यह दिखता है कि पीडिता को न्याय नहीं मिला , एक पुलिसवाले ने अपने रशूख का इस्तेमाल किया.
पर परत दर परत अगर इसे ध्यान से देखा जाये तो आप पाए गे कि अकेले राठोर के बस की बात नहीं थी रुचिका के परिवार के साथ गुंडागर्दी करके बच के निकाल जाने का. वो स्कूल क्या कम जिम्मेदार है जिसने रुचिका को निर्दोष जानते हुए भी उसे स्कूल से निकाल दिया ? उस स्कूल में पढनेवाले बच्चो के माता - पिता क्या कम दोषी है जिनोह ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई, जबकि मीडिया शुरू से रुचिका के साथ खड़ा था .अगर आज उनिह में से किसी अभिबवाक के बच्ची के साथ यह हुआ होता तो वे सारे समाज को कोसते .

अगर आम जनता और उसके स्कूल के साथी रुचिका को इंसाफ दिलवाने में जरा सी भी दिलचस्पी दिखलाते तो शायद यह केस इतना लम्बा नहीं खीचा होता. जब रुचिका की एक दोस्त का साहस आज राठोर को जेल हवा खिलवाने का परवान निकलवा सकता है तो ,उसके पूरे दोस्तों की मशकत कितना बड़ा परिणाम समाज के सामने रख जाती . राठोर जैसे लोग अपने -आप में अकेले कभी शक्तिशाली नहीं बन सकते, जब तक समाज चोर दरवाजे से इनके साथ न खड़ा हो . राठोर जैसे पुलिस वाले जानते है कि समाज के कई करता-धर्ता उनका मुखर विरोध कभी नहीं करेगे बल्कि चोर दरवाजे से उनसे अपने गलत कामो के लिए उल्टा और सहयोग लेने आयेगे .
दूसरा पहलू : राठोर जैसे लोगो को परिवारवालों का भी खूब सहयोग मिलजाता है जबकि रुचिका जैसे पीड़ित लोगो के परिवारवाले भी पूरे परिदृश्य से गायब होना या झुक जाना ज्यादा पसंद करते है .क्या राठोर की पत्नी और उसे जानने वालो ने उसका सामाजिक बहिष्कार किया ? उल्टा उनकी पत्नी कोर्ट रूम में उसके साथ खड़ी होकर उनके साथ होने का प्रमाण दे रही थी.क्या लोगो को राठोर को सामाजिक निमंत्रण सूची से बाहर निकला ? अगर न्याय के लिए यही हमारी प्रतिबधता है तो न्याय का यही हाल होगा और राठोड जैसे लोग तुरंत सजा के बाद जमानत पा कर हंसा करेगे . आरोपी को परिवार का सहयोग मिलने वाली बात सिर्फ राठोर के सन्दर्भ में ही नहीं और कई केस जैसे आर के शर्मा - शिवानी भटनागर , प्रियदर्शनी मट्टू, जेस्सिका लाल के केस में भी हम देखते है. धनञ्जय को फासी की सजा में उसकी पत्नी और उसका पूरा परिवार उसे निर्दोष साबित करने के लिए खड़ा था पर पीडिता /मृतिका के परिवार वालो का कुछ पता नहीं था .
आखिर में: इस पूरे परिदृश्य में महिला संगठनो का तो कुछ पता ही नहीं, उनके धरना- प्रदर्शन कहा गए ? और राष्ट्रीय महिला आयोग , राज्य महिला आयोग ? इनकी भूमिका तभी परदे पर आती है जब टीवी या मीडिया वाले इनको झझोरते है.
अंत में : बिना मीडिया की पैरवी के किसी को इंसाफ मिलना इस देश में इतना क्यों मुश्किल है?
माधवी श्री

संध्या और औरत होने की पीड़ा

बहुत अच्छा लिखा है संध्या ने या ये कहू कि महिला होने का कर्त्तव्य अदा किया है. बहुत पहले ये रिपोटिंग मैंने पढ़ी थी , जब मै कॉलेज में थी कोलकाता मै. यकीन मानिये वो रिपोर्टिंग आज भी मेरे दिमाग में उतनी ही ताजा है जितनी कि आज पढ़ कर. आप कह सकते है कि उस रिपोर्टिंग का HORROR आज भी मेरे दिमाग से नहीं गया है. मेरे ख्याल से किसी भी लड़की या स्त्री के दिमाग से नहीं जा सकता. ये रिपोर्टिंग उस समय KOLKATA 'S TELEGRAPH के WOMEN section में निकली थी . आज भी ये कहानी हर अख़बार में है छापी है वर्सो बाद . औरतो का दर्द सिर्फ खबर बन कर रह जाता है. जजों- वकीलों के लिए बहस का मुद्दा भर . सबूतों की तलाश में उसकी जिंदगी इंसाफ के लिए दम तोड़ देती है पर साबुत नहीं जुटा पाता है - न समाज न इंसाफ के पैरोकार . मजे की बात हैकि उनकी कहानी पिंकी जैसी अकेली महिला सामने लाती है , महिला संगठन का इसमें कोई रोल नहीं , वो तो कही बैठ कर" दान - चंदे " का मामला सुलझा रही होती है. वर्षो से औरत पर बलात्कार करना उसे काबू में या बदला लेने का माध्यम रहा है. इसलिए बलात्कारी को इतनी काम सजा नहीं दे कर छोड़ा जाना चाहिए. उसे एक हत्यारे से भी बड़ी सजा होनी चाहिए क्यों कि उसने जीते जी एक इन्सान की हत्या की है.
लिखना तो बहुत चाहती हूँ इस पर इसलिए नहीं कि ये मेरा पेशा है बल्कि मै सिद्दत से महसूस करती हूँ तभी लिख पाती हूँ . पर मै आज लिखने के बजाय आपको कुछ पढवाना चाहती हूँ. एक नयीलेखिका है , उसने भी बहुत सिद्दत से इस पर कुछ लिखा है. संध्या पेशे से विदेशी कंपनी में नौकरी करती है और किसी से प्रेम ( जो हर लड़की इस उम्र में करती है ....). आप उसके लिखे को जरूर पढ़े
http://jaanahaitaaroseaage.blogspot.com/

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

आज जहा महिलाये हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है वही उनपर दूसरी और लगातार जद्तियो- अत्याचार की खबरे भी लगातार आ रही है . २००९ में जहा आई ए एस की सर्विस में महिला ब्रिगेड ने अपना परचम लहराया है तो वही दूसरी और रास्ट्रीय महिला आयोग ,विभिन्न राज्यों की महिला आयोगों, महिला अपराध सेल के समक्ष महिलाओ के खिलाफ बढती जद्तियो के आकडे भारत में महिलाओ की स्थिति के दो पहलू उजागर करते है. एक और जहा महिलाओ के प्रति समाज ,माँ- बाप का रवैया बदला है वही समाज में पूरी तरह से अपेक्षित बदलाव नहीं आये है . इस कारण जिसतरह के कामो के लिए महिलाओ को चुना जा रहा है उससे समाज का जो जटिल चेहरा उभरता है वो यही कहता है कि महिलाओ को स्थान तो मिल रहे है पर निर्णय लेने वाले पदों के लिए नहीं .इसी कारण मिस मेरठ तो प्रियंका तो चुन ली जाति है पर अपने मनपसंद के काम के लिए घर से बहार निकल कर शोषण के अंत हीन दलदल में वो फस जाति है अंत में सम्पति के अधिकार के लिए बोखालाई प्रियंका के हटो माँ- बाप का खून हो जाता है . प्रियंका की कहानी तथाकथित आधुनिक महिलाओ के शोषण और हार की कहानी है और निक्कमी व्यवस्था ,दोहरे माप दंड के समाज की कहानी है. ये उन तामम महिला संगठनो और महिला आयोगों के निकामेपन की कहानी है जो उदित नारायण, मटुक नाथ या यू कहे हाई प्रोफाइल टीवी में प्रर्दशित केसों के लिए समय तो निकल लेती है पर जरूरतमंद लड़कियो को सब्र का पाठ पढ़ने के अलावा इनके पास कोई काम नहीं रहता.
पंचायती राज में भले ही महिलाओ को आरक्षण मिलगये हो ३३% तक और बिहार में तो ५०% आरक्षण दे दिए गए है ,पर महिला सरपंच का काम उनके पति -बेटा -पिता या घर का कोई पुरुष संभालता है ऐसी खबरे प्राय आती रहती है. ऐसा नहीं है कि यह समाचार सिर्फ पंचायत के दरवाजे से आते है राजनितिक, व्यावसायिक , पत्रकारिता, फिल्म हर तरह के पेशो से इस तरह कि सूचना आती रहती है. महिलाओ कि तरक्की के पीछे उसकी परवारिक पृष्ठ भूमि का होना बहुत महत्वपूर्ण हो गया है. यही समाज का असली चेहरा है.
संसद में भी जो महिला आरक्षण की मांग पिछाले ११ वर्सो से टरकई जा रही है उसके पीछे भी पुरुष सांसदों की असुरक्षा की भावना काम कर रही है. वे सीट बढ़ने की बात मानने पर आरक्षण देने का इशारा तो कर रहे है पर जो सीटे अभी है उनमे से बटवारा नहीं चाहते. ये सिर्फ संसद की सच्चाई नहीं है वल्कि हमारे घरो की भी सच्चाई है. जहा हम अपनी बेटियो को अपने हिस्से से कुछ नहीं देना चाहते बल्कि अलग से कुछ देने पर विस्वास करते है. इसी कारण हम सहर्ष दहेज़ तो देना स्वीकार करते है पर सम्पति में उसका हक़ अभी तक अस्वीकार करते है.

दिल्ली का विकास

दिल्ली का विकास जिस तेजी के साथ हो रहा है उतनी ही तेजी के साथ इसकी समस्याए बढ़ती चली जा रही है. यहाँ अपने सुनहरे भविष्य की तलाश में हर कोई आता है , ये उनका हक है और दिल्ली को उनकी जरूरत भी है .पर बात यह है कि क्या सरकार दिल्ली या दिल्लिवासियो कि समस्यों को भाप प् रही है है पहले से . या ऐसा तो नहीं कि भाप कर भी नासमझ बनी हुई है. किसी भी सरकार की सफलता उसके नागरिको की समस्याओ को पहले से भाप कर उसके निपटारे में होता है. पर सरकार तो यहाँ जब समस्या सर पर आजाती है तब जा कर चेतती है. ज्यादातर समय तो सर पर आजाने पर भी नहीं चेताती. तीन बार दीली दरबार में अपनी जीत दर्ज करा चुकी शीला सरकार के दफ्तर में तो राम -राज्य चल रहा है. सभी उनके चेहते नौकरशाह . है किसी कि मजाल जो सरकार के खिलाफ कोई न्यूज़ देने कि जुर्रत कर सके?
कोमन वेअल्थ गेम कि तैयारी का आलम तो यह है कि अंतर -राष्ट्रीय स्तर पर से हमे डांट पड़ जाती है, प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को गुहार लगाई जाती है कि वो आकर हस्तक्षेप करे . यह घटना विश्व समुदाय को क्या मेसेज भेजता है ? क्या हमारी अंतर -राष्ट्रीय स्तर कि साख को बट्टा नहीं लगता?
क्या दिल्ली इस अंतर -राष्ट्रीय स्तर के खेल के लिए पूरी तरह से तैयार हो रही है? सिर्फ कुछ खास - खास जगह के बस स्टैंड के पुराने मॉडल को हटा कर नए मॉडल के स्टील के बस स्टैंड लगा दिए या यू कहे खड़े कर दिए जा रहे है. इन नए चमकीले बस स्टैंड कि हालत यह है कि विकलांगो के लिए जो स्टैंड के साथ ढलान बनी है उससे कितनी बार दो पाव वाला आदमी भी फिसल कर गिर जाता है. गौर करने कि बात है कि विकलांग व्यक्ति उस बस स्टैंड कि ढलान तक कैसे पहुचे आसानी से ताकि वो बस पकड़ सके ? हमारे नौकरशाह जो विदेशो से मॉडल चुरा कर लाते है कभी इस बात पर गौर किया है कि ढलान के बाद जो फुटपाथ है वह किस लायक है कि जिसमे अच्छा - खासा आदमी भी ढंग से नहीं चल पता. विदेशो में एक सरल रेखा- सामान स्तर पर फुटपाथ और बस - स्टैंड बने होते है. हमारी दिल्ली की तरह नहीं. जिसे देख कर लगता है कि मानो रात को हनुमान जी ने आकर उस बस स्टैंड को गलती से वहा छोड़ दिया हो.
अ़ब दूसरी बात करे, सिर्फ दो -चार जगहों के बस स्टैंड सजा कर के दिल्ली का चेहरा चमकाने के बजाय पूरी दिल्ली के बारे में सोचा जाता जहाँ कही -कही तो समूचा बस स्टैंड ही नहीं है. पोश एरिया के पुराने बस स्टैंड को उखाड़ कर नए बस स्टैंड लगाने का जो खर्च आ रहा है दोनों मिला कर तो पुराने -पिछडे इलाके की दिल्ली का भला किया जा सकता था. ये हालत देख कर ऐसा लग रहा है कि "जिसके सर पर तेल होता है ,लोग उसके सर पर और तेल डालते है " वाली कहावत चरितार्थ हो रही है. पोश इलाको की सडको का भी बहुत बेहतर हाल नहीं है. साउथ एक्स, डिफेन्स कालोनी की सड़के आपको हमेशा खुदी- फुदी मिल जायेगी . जिसे देख कर नहीं लगता की आप किसी पोश इलाके में घूम रहे है. दिल्ली में साउथ एक्स के बी ब्लाक का यह हाल है कि वहा की नाली हमेशा बहती रहती है जिसे देख कर किसी को भी लगेगा कि ये कोई गाँव है क्या या दिल्ली का कोई समृद्ध इलाका ? न्यू फ्रेंडस कालोनी में तो पिछाले एक -डेढ़ महीने से जो हड़प्पा - महान्जोदारो कि खुदाई चल रही है उस को अंत होने का नाम ही नहीं है सिर्फ नाली व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए ये हाल है तो बड़े विकास कर्यकरामो का क्या होगा?
डेढ़ महीने से वहा कि जनता एक दूसरे से लड़- भीड़ कर गाड़ी - रिक्शा - साइकिल चला रही है,पैदल वालो का क्या कहे बेचारे हमेशा ही रोते रह जाते है.

अब बात करे यहाँ के दिल्ली निवासियो की क्या वे आने वाले विदेशी मेहमानों का दिल जितने की तैयारी कर रहे है या उनेह लूटने की ? जैसा अनुभव ले कर हमारे विदेशी मेहमान यहाँ से जायेगे उस पर ही हमारी छवि और पर्यटन विभाग की छवी निर्भर और उसकी भविष्य में होनेवाली कारोबार निर्भर करती है. क्या हम अपने दिल्लिवासियो को कुछ मंत्र नहीं दे सकते जिससे कि वो इन विदेशी मेहमानों के दिल पर छा जाने का काम करे और दिल्ली के लिए पर्यटन के दरवाजे खोल दे . और कई लोगो को रोजगार भी उपलब्ध करवा सके. पर जिस तरह से स्थानीय दिल्ली निवासी बाहर से आये छात्रों से साथ बदसलूकी करते है किराये और सुबिधा के लिए उसे देख कर तो नहीं लगता कि हम विदेशी मेहमानों का दिल जीत सके गे और अपनी साख बना सके गे.
और अंत में दिल्ली पुलिस की भूमिका - क्या पुलिस इतने बड़े कार्यकर्म के लिए सबेदनशील तरीके से तैयार हो रही है. छोटे व्यापारियो की तो वो हर समय माँ - बहन एक करने में लगे रहते है. उनसे रिश्वत भी लेते है. ये मौका उन बेचारो के लिए भी कमाने का है सिवाय कि बड़ी मछलियो के क्या उनको सही से तरह से वे संभल सकेगे. आम जनता के साथ पुलिस का व्यहवार कैसा रहता है उस पर मै कोई टिपण्णी नहीं करना चाहती हु. पर विदेशो में पुलिस का रोल मददगार का होता है यहाँ एक हक्नेवाले गरेडिया का . क्या इस भूमिका में कुछ बदलाव लाया जा सके गा.
और एक बात जहा गुंड होगा मख्खिया तो आयेगी ही. विदेशियों को देख कर अगल बगल के राज्यों से चोर - उचक्कों -बदमाशो का भी खतरा बढ़ जाये गा. उससे पुलिस कैसे निपटने कि तैयारी कर रही है? क्या इन सभी संभावित राज्यों से पुलिस का तालमेल अच्छा है? इन सब बातो पर धयान दिए बिना तो दिल्ली कि छवी सुधरने से रही.

महिला पुलिस और समाज का नजरिया

समाज में महिला पुलिस को लेकर कई तरह की गलत फहमिया है जिस के कारण आज पुलिस का पेशा महिलाओ में उतना लोकप्रिय नहीं रहा जितना मॉडलिंग,फिल्म ,शिक्षा अन्य पेशे लोकप्रिय है. उच्च
पदों पर तो महिला पुलिस को इज्ज़त मिल जाती है समाज में पर कांस्टेबल के पदों पर उसे सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ता है. यह हाल सिर्फ समाज का नहीं है महिला कांस्टेबलओ को अपने अमले में भी दोहरे मापदंडो का सामना करना पड़ता है. ड्यूटी निभाने ,पोस्टिंग को लेकर उनके साथ भेद -भाव की खबरे आम है . कांस्टेबल पद पर कार्यरत महिलायों में इतना साहस और एक जुटता नहीं होती कि वे अपने बड़े अधिकारियो की शिकायत कर सके. न ही उनका कोई संगठन है कि वे अपनी बात एक जुट हो कर सामने ला सके. वैसे भी पुलिस में महिलाओ का प्रतिशत ३.२९% ही है . जो पुरुष पुलिस की तुलना में काफी कम है ,इसके कारण भी वे कमजोर पड़ जाती है.


विदेशो में यूरोपियन महिला पुलिस संगठन मौजूद है, अंतर राष्ट्रीय स्तर पर भी महिला पुलिस का एक संगठन मोजूद है. पर भारत में अभी तक ऐसा कोई संगठन नहीं बना है. वैसे पुलिस में महिलाओ का प्रतिशत देखते हुए इसकी उम्मीद भी कम लगती है. पर तमिलनाडू में महिला पुलिस का प्रतिशत काफी उत्साहवर्धक है(१०.३२%) . दिल्ली चौथे स्थान पर ५.०३% के साथ महिला पुलिस कर्मियो के साथ खडा है. बिहार में एक भी महिला थाने का न होना अपने आप में एक खबर है. पर बिहार की दबाग महिला आईपीएस अधिकारी शोभा अहोतकर भी हमेशा अपने कामो के लिए खबरों में जानी जाती रही है. ऐसा नहीं है कि पूरे विश्व में महिला पुलिस की संख्या उत्साह जनक है अमेरिका (११.२%),कनाडा (१६.५%),इगलैंड (१९.५%) दक्षिण अफ्रीका (१६.६७%) के आकडे भी काफी उत्साह वर्धक नहीं है, पर स्थिति भारत से काफी बेहतर है. अभी भारत में महिला पुलिस कर्मियो को बदलाव के लिए काफी मुखर होना पड़ेगा .
पुलिस में महिलाओ की उपस्थिति की वकालत करे वालो का मानना है कि इससे महिलाओ अपराधियों और पीडितो के प्रति संवेदनशीलता बढेगी . पर मीडिया में कई आने वाली खबरों में महिला पुलिस द्वारा महिला पीडितो के प्रति असम्बेदंशील व्यहवार से इस अवधारणा को अघात पहुचता है. पर इन खबरों से हमे महिलाओ की पुलिस में उपस्थिति पर एक तरफा विचार भी नहीं करलेना चाहिए. यकीनन आने वाले दिनों में महिलाओ की उपस्थिति से समाज और पुलिस में परिवर्तन अवश्यम्भावी है.

महिला पत्रकारों की कहानी

जब पत्रकारिता में पुरुषों का वर्चस्व था और जल्दी किसी महिला का इस पेशे में होना एक दुर्लभ बात मानी जाती थी तब से इस पेशे से जुडी नीरजा चौधुरी आज दिल्ली में स्थित महिला पत्रकारों के प्रेस क्लब की अध्यक्ष ही जिसमे 550 से अधिक केवल महिला पत्रकार सदस्य है. ३५ वर्षो से आधिक के अपने लम्बे सफ़र में नीरजा ने कई उतर -चढाव देखे है. अपने पुराने दिनों को याद करती हुई नीरजा कहती है कि ६० के दशक में जब मुंबई में वे "हिम्मत " से जुडी थी तब the statesman के तत्कालीन संपादक कुलदीप नैयेर ने एक समारोह में कहा था कि - हम महिलाओ को प्रेफेर नहीं करना चाहते क्यों कि प्रशिक्षित करने के बाद वे शादी करके चली जाती है . उनके लिए नौकरी वेटिंग रूम की तरह होता ही. ७० के दशक में यही तस्वीर ३६० का यू टर्न लेती है. ७० के दशक में the statesman के तत्कालीन संपादक सी आर ईरानी कहते है कि - हम महिलाओ को पत्रकारिता में प्रेफेर करते है क्यों कि वो सीरियस , समर्पित और भरोसेमंद होती है . नीरजा मानती है कि यह एक दशक का बहुत बड़ा क्रन्तिकारी बदलाव है . नीरजा के लम्बे पत्रकारिता के कैरीअर में खुद को एक पॉलिटिकल पत्रकार की तरह स्थापित करने के लिए उनोहने कभी देर रात पार्टी , क्लब , इधर-उधर बेबजह दौड़ने का सहारा नहीं लिया . अपने परिवार और काम के बीच में संतुलन स्थापित करने के लिए नीरजा बतलाती है की जब वो इंडियन एक्सप्रेस में थी तब सुबह की मीटिंग में रहने होने के बाद वे सीधे घर की और दौड़ती थी , तभी उनोहने गाड़ी भी खरीदी थी अपने काम में सामंजस्य स्थापित करने के लिए. जब उनके सहकर्मी ऑफिस के बाहर चाय-पानी पीते थे तब वे अपने बेटे के साथ क्वालिटी टाइम गुजर रही होती. इसके बाद वे फिर ऑफिस की और दौड़ती ,या अपने सोर्स की तरफ. नीरजा कभी अपनी स्टोरी के लिए एक सोर्स पर निर्भर नहीं रही है. वे सब से बात -चीत करना पसंद करती है. हंसमुख और मिलनसार स्वभाव की नीरजा युवा पत्रकारों के साथ भी उतनी ही गरम जोशी के साथ मिलती है जितना कि वे अपने वरिष्ट पत्रकार मित्रो और राजनेताओ के साथ मिलती है. ये नीरजा की ही पारखी नजर का कमाल है कि १९९५ में वो सोनिया गाँधी पर लिखती है -" AT THE MOMENT SHE IS MORE LIKELY TO POSITION HERSELF IN SUCH A WAY SO THAT SHE CAN BE THE POWER BEHIND THE THRONE ". ये उनोह ने एक दशक पूर्व तब लिखा था जब २००४ में सोनिया गाँधी ने अपने प्रधानमंत्री न बनाने की प्रसिद्ध घोषणा की थी .
नीरजा का नाम अगर पॉलिटिकल पत्रकारिता में आदर के साथ लिया जाता है तो शांता सरबजीत सिंह का नाम कला और संस्कृति पत्रकारिता में परिचय का मोहताज नहीं है . उनोह ने THE FIFTIETH MILESTONE; A FEMININE क्रितिकुए नामक पुस्तक लिखी जिसमे ५० महत्वपूर्ण महिलाओ के बारे में जानकारी दी गयी है. जो भारत के ५० स्वाधीनता वर्षगाठ के अवसर पर आई . इसके अलावा NANAK, THE GURU भी उनोह ने लिखी है. वे consultant for UNESCO and the World Culture Forum Alliance ( WCFA) जैसी अंतररास्ट्रीय संस्था की सलाहकार भी है. १९७२ से वेHindustan Times में नृत्य पर निरंतर लिख रही है और गुलाबी अखबार " The Economic टाईम्स" की स्थाई स्थाभ्कर है २५ वर्षो से ज्यादा (१९७०--२०००) . इसके अलावा देश - विदेश के अन्य पत्र- पत्रिकाओ में निरंतर उनके लेख छपते रहते है. उनोहने देव्दाशी परंपरा और लदाख की संस्कृति पर एक वृत्त चित्र भी बनाये है. वे कई रास्ट्रीय और अंतररास्ट्रीय स्तर की कमिटी में रही है और रास्ट्रीय फिल्म समारोह में जूरी के पड़ को भी सुशोभित किया है. इसके अलावा कैनंस और बर्लिन अंतररास्ट्रीय फिल्म समारोह में उनेह लगातार बुलाया जाता है भारतीय मीडिया में लेखन के लिए. शांता - नीरजा की पीढी में पत्रकारिता के क्षेत्र में कोमी कपूर ,उषा राय , कल्याणी शंकर का नाम उनके कामो के कारण लिया जाता है . ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली के पॉवर सर्कल का ऐसा कोई भी गॉसिप नहीं है जो कोमी कपूर और उनके पत्रकार पति को मालूम न हो. उषा राय जब टाईम्स ऑफ़ इंडिया में थी और जब वे पहली बार गर्भवती हुई तो उनोहने छुट्टी मांगी तब उनेह कहा गया - the rule books had to be consulted for TOI had no tradition of maternity leave. ऐसा कहा जाता है कि जब वरिष्ठ पत्रकार बच्ची काकरिया statesman में नौकरी के लिए गयी तो उनेह यह कह कार मना करदिया गया कि स्तातेस्मन में महिला टॉयलेट नहीं है. आज की महिला पत्रकारों को यह जान कर आश्चर्य होगा कि नौकरी न मिलने कि यह भी वजह हो सकती है.
महिला पत्रकारों के लम्बे संघर्ष का नतीजा है कि आज पत्रकारिता का परिदृश्य बदल है. पर उपस्थिति बदली है स्थिति नहीं. दिल्ली में भास्कर की तेज तर्रार पॉलिटिकल पत्रकार स्मिता मिश्र जो अपने बीजेपी कवरेज के लिए जानी जाती है
उनोह ने जब दस साल पहले पत्रकारिता शुरू की थी जम्मू - कश्मीर जैसे सवेदनशील इलाके से तो महिला पत्रकारों को हार्ड बीट नहीं दिया जाता था केवल संस्कृति -सेमिनार तक उनेह सीमित रखा जाता था. जब स्मिता ने आर्मी,पुलिस और राजनीती जैसे मुद्दे पर लिखना शुरू किया तो उनेह ओउत्सिदर होने का दंश झेलना पड़ा . पर अपने काम से उनोह ने सब का मुंह बंद कर दिया. आर्मी के द्वारा बुलाई गयी "पत्रकारों की विजिट गाव में " से उसने युवा महिलाओ के आपरेशन की ऐसी स्टोरी अमर उजाला वालो के लिए ब्रेक की कि उसके सारे एडिशन में उसे लेलिया गया . इसके बाद तो आर्मी वाले उससे सतर्क रहने लगे और उसे काम में म़जा आने लगा.
]ज्योति मल्होत्रा का नाम विदेश मामलो कि जानकर के रूप में सम्मान के साथ लिया जाता है. २५ वर्ष के लम्बे सफ़र में ज्योति ने अपनी शुरुआत कोलकाता के telegraph अखबार से कि थी. उसके बाद वे इंडिया एक्सप्रेस, टाईम्स ऑफ़ इंडिया , मिंट आदि कई अखबारों से गुजरते हुए आज दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकार है. ज्योति कि यादगार रिपोर्टिंग में २००१ कि मुशरर्फ का आगरा सम्मेलन रहा जब वे ९ माह की गर्भावस्था में थी. उस समय उनेह बड़ा रोमांच आया था रिपोर्टिंग करने में. ज्योति बताती है कि उनके सभी सहकर्मीयो ने उनके साथ भरपूर सहयोग किया था. वे ज्योति के सामने सिगरेट नहीं पीते थे, ज्योति ने खुद सिगरेट उस समय छोड़ रखी थी.
वर्तिका नंदा जो NDTV के दिनों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपने अपराध के सवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए जानी जाती है का मानना है कि महिला पत्रकार को अपने महिला होने कि पहचान को बचाए रखते हुए पत्रकारिता करनी चाहिए. उनके यादगार रिपोर्टिंग में उत्तरी दिल्ली का एक दहेज़ हत्या का मामला है जिसमे मृतका के आखो में उसके ससुराल वालो ने सुई चुभो कर मारा था. वर्तिका बताती है कि उसने रिपोर्टिंग ख़तम करके उस मृतिका की साँस से कहा - आंटी जब आप की बेटी के साथ भी ऐसा हो तो मुझे जरूर बुलाना.

काफी लम्बी यात्रा करचुकी महिला पत्रकारों की बड़ी लम्बी लिस्ट है - जिसमे शुभा सिंह ,अन्नू आनंद , पारुल जो दिल्ली जनसत्ता में एडिशन भी संभालती है ,सेवंती नैनं जो अपना the hoot .org नामक मीडिया पर वेब साईट चलती है ,मनिका चोपडा, .हिनुस्तान अखबार की संपादक मृणाल पाण्डेय . दिल्ली के प्राय सभी रास्ट्रीय -अंतररास्ट्रीय अखबार - पत्ररिकाओ में महिला पत्रकारों ने अपनी महत्वपूर्ण जगह बना ली है. ये सब उनके लगातार कठिन परिश्रम की नतीजा है.

अभी हाल में २ नवम्बर को चंडीगढ़ प्रेस क्लब की ओर से आयोजित महिला पत्रकारों पर केद्रित सेमिनार में वरिष्ठ पत्रकार ननकी हंस ने कहा कि कमसे कम ४०% महिलाये जो मीडिया में है काफी लम्बे समय से अपने पदोन्नति का इन्तेजार कर रही है. आगे ननकी कहती है कि महिलाये शोषण को चुपचाप सहने की आदी हो गयी है .उनोह ने इस बातकी ओर सभी का ध्यान दिलवाया कि उत्तर - पूर्व राज्यों में केवल २५ महिला पत्रकार है. ननकी हंस ने कहा कि कमसे कम ४०% महिलाये जो मीडिया में है काफी लम्बे समय से अपने पदोन्नति का इन्तेजार कर रही है. आगे ननकी कहती है कि महिलाये शोषण को चुपचाप सहने की आदी हो गयी है .उनोह ने इस बातकी ओर सभी का ध्यान दिलवाया कि उत्तर - पूर्व राज्यों में केवल २५ महिला पत्रकार है.इस सम्मलेन में यह बात भी निकल कर आयी कि टॉप एडिटोरिअल पोसिशन में केवल ६% महिलाये है .

दिल्ली में भारतीय महिला पत्रकार कोर्प्स की स्थापना की कहानी भी महिला पत्रकारों की कहानी से कम दिलचस्प नहीं है. एक बार १८ महिला पत्रकारों ने प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के प्रागन में बैठ कर निर्णय लिया की उनका भी अपनी एक ऐसी जगह होनी चाहिए जहा सभी महिला पत्रकार एक दूसरे से मिल सके. आपस में चर्चा कर सके. वरिष्ठ पत्रकार सरोज नागी जो इस गोष्ठी में शामिल थी का कहना है कि यह क्लब पीसीआई की प्रतिछाया नहीं है बल्कि महिलाओ के लिए अपने एक स्थान की कल्पना थी. नीरजा कहती है कि उन १८ महिलाओ ने १००० रुपये अपने पास से निकले और एक फंड तैयार हो गया. फिर जगह के लिए जद्दो जहद की गयी . उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के हस्तक्षेप से लुटियन दिल्ली में संसद का एक खाली बंगला महिलाओ को अपने प्रेस क्लब के लिए मिला. पहली बैठक में सभी अपने घर से लाये हुए दरी - कुशन पर बैठी. उन १८ दूरदर्शी महिला पत्रकारों के नाम है मृणाल पांडे , उषा राय,कल्याणी शंकर ,रश्मि सक्सेना,

कोमी कपूर , हरमिंदर कौर, अनीता कात्याल , कुमकुम चढ्ढा ,मनिका चोपडा , राधा विस्वनाथ , नीरजा चौधरी, पामेला फिलिपोसे, ऋतंभरा शास्त्री , रश्मि सहगल, सुषमा रामचंद्रन ,सरोज नागी , शीला भट्ट और अमृता अभरम . आज ये १८ महिलाओ पत्रकारों की संख्या बढ़ कर ५०० से ऊपर हो गयी है . जिसके क्लब में मीरा कुमार, कृष्ण तीरथ , प्रणब मुकर्जी ,पाकिस्तान के विदेश मंत्री कुरैशी तक आचुके है.प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह अपने प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत महिला पत्रकारों के दल को संबोधित कर शुरू करते है. ये महिला पत्रकारों की जमात की मह्तावता को रेखांकित करती है.

मंदी के दौर में महिलाये

आये हुए इस मंदी के दौर ने जहाँ सभी विश्व- व्यापार जगत को प्रभवित किया है वही छोटे - छोटे बसेरो और घरेलू महिलाओ को भी बुरी प्रभावित किया है.साहित्य और कला जगत से जुड़े लोग इस दौर को कैसे देखते है और इनकी व्याख्या कैसे करते है इससे हमे मंदी को अलग तरीके से समझने में मदद मिलती है . कवियत्री और संबेदनशील लेखिका अनामिका के शब्दों में मंदी के इस दौर में मीडिया द्वारा बनाई " सुपर माँ " की भूमिका में कैद "आम माँ " मंदी की मार में ज्यादा से ज्यादा सामान खरीदने में असक्षम हो रही है और घर में बच्चो के गुस्से का शिकार हो रही है . मीडिया ने आज "सुपर माँ " की छवी ऐसी बना दी है जिसका अर्थ सफल माँ होने का पर्याय वही माँ है जो सिर्फ ज्यादा से ज्यादा सामान और घर के लिए साजो -सामान की वस्तु उपलब्ध करवा सके. इसमें भावना और संवेदना के लिए जगह बहुत कम पड़ गयी है. . पति, बेटा और परिवार के अन्य पुरुषों के लिए भी वो " बाक्सिंग की पंचिंग बैग " की तरह है जिनपर घर के पुरुष अपना गुस्सा ,क्षोभ, बाहर का गुस्सा निकलते है . इन हालातो में जब घरेलू महिलाये घर के बजट से जूझ रही है उसी समय घर के पुरुषों का अतिरिक्त दबाब भी उनेह झेलना पड़ जा रहा है क्योकि मंदी की मार झेल रहे पुरुष कारोबार की परेशानिया घर आ कर स्त्रियों पर ही निकलते है. अनामिका के इस कथन पर अगर गौर करे तो पाएगे कि मध्यवर्ग की महिलाये अपने जीवन स्तर और बजट की कमी के बीच लगातार संतुलन बनाने का युद्घ लड़ रही है.
वही लेखिका कमल कुमार मंदी से जूझती कारपोरेट जगत की महिलाओ की कशमकश बताते हुए कहती है कि मंदी के इस दौर में अच्छे से अच्छे पदों पर कार्यरत महिलाए या तो अपनी नौकरीयां गवा बैठी है, या उनकी सैलरी कम कर दी गयी है , या उनकी बोनस - पदौनात्ति रोक दिया गया है, ऐसे हालत में जिन्होंने क़र्ज़ पर घर ,मकान ,गाड़ी या घर की अन्य जरूरी वस्तुओ को लिया है उनके लिए बड़ी विकट समस्या हो गयी है बजट में संतुलन बैठना. जो महिलाये फॅमिली प्लानिंग के कारण माँ बनाने के लिए नौकरी छोड़ कर सिर्फ अपने पति की कमाई के भरोसे घर बैठ गयी है उनकी परेशानी के बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते. कमल जी कहती है कि ये सब उनका आँखों देखा हाल है, कोई सुनी सुनाई बात नहीं. उनके परिचित एक परिवार है जिसमे पति को रात गए देर तक काम करना पड़ रहा है सिर्फ अपनी नौकरी बचाने के लिए. प्रमोशन रोक दिया गया है, ऐसी स्थिति में घर की गृहदी पर जो मानसिक दबाव पड़ रहा है उसकी कल्पना नहीं की जा सकती. एक अनिश्चतता की तलवार घर की स्त्री पर लगातार टगी रहती है. ऐसे में परिवार एक नाहक मानसिक दवाव में लगातार जी रहा है. कमल जी के अनुसार विदेशो में अब मंदी के असर के कम हो जाने पर वहां कर्मचारियो की सैलरी बढा दी जा रही है, वही भारत में अभी तक सकारात्मक करवाई नहीं शुरू की गयी है इस कारण बहुत सारे गैजरूरी समस्याए अभी भी हमारे समाज और पारिवारिक जीवन का हिस्सा बने हुए है.
गाँधी गुजरात विद्यापीठ ,अहमदाबाद में गुजराती भाषा की विभाग प्रमुख श्रीमती उषा उपाध्याय गुजरात में डायमंड व्यवसाय से जुड़े कई गरीब मजदूरो और उनकी स्त्रीओ की व्यथा बताती है कि वहां मजदूर सपरिवार आत्महत्या कर रहा है जिस कारण महिला भी इस अस्मिक त्रादसी का शिकार सपरिवार हो रही है.वही सिक्के का दूसरा पहलू उजागर करते हुए बताती है कि गुजरात में कारपोरेट क्षेत्रो में महिला कर्मचारियों की कार्यनिष्ठा और कर्त्व्यप्रनता के कारण उन्हें नौकरियो से कम निकला जा रहा है.उनकी ईमानदारी के कारण वे पुरुषों की तुलना में कारपोरेट क्षेत्रो की पहली पसंद बनी हुई है . पर उषा जी की बातो का दूसरा निष्कर्ष यह भी निकलता है कि महिलाये अपना पारिवारिक जीवन दावं पर लगा कर अपनी नौकरी बचा रही है. धोखा और गडबडी कम करने के कारण वे कारपोरेट दुनिया कि पहली पसंद बनी हुई है.
"महिला लेखिकाओ पर क्या मंदी का असर पड़ा है " इस पर राजकमल प्रकाशन समूह के कर्ताधर्ता श्री अशोक महेश्वरी का कहना है कि चूकि हिंदी का पाठक वर्ग काफी समृद्ध परिवार से नहीं होकर आम जनता होती है इस कारण उनके व्यवसाय पर उतना प्रभाव नहीं पड़ा है. चूकि "महिला लेखिका " जैसी अलग श्रेणी विभाजन वे नहीं करते, इस कारण वे इस बारे में कुछ अलग से नहीं कह सकते. अशोक जी ने कहा कि हिंदी आज उन्नति कर रही है , पहले "मॉल" वगेरा में हिंदी की किताबे नहीं रखी जाती थी पर आज हिंदी की किताबे अग्रेजी की किताबो के साथ प्रतियोगिता कर रही है. इस कारण इसमें गुणवत्ता की दृष्टी से काफी बदलाव आये है.

मंदी के इस दौर में दिल्ली में छोटा सा भी सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने में जब खून - पसीना एक हो जा रहा है तब उस समय अंतररास्ट्रीय स्तर का १२ दिवसीय ,२०० से भी अधिक कार्यक्रमों के साथ २३ स्थानों पर देशी-विदेशी कलाकारों के साथ एक साथ प्रस्तुत होना जिसमे सयुक्त राष्ट्रमंडल देशो के कलाकार भी शरीक कर रहे हो आसान काम नहीं है. पर इस असंभव काम को संभव कर दिखाया है प्रतिभा प्रह्लाद और अर्शिया सेठी की जोड़ी ने बिना किसी सिकन और गडबडी के . जब प्रतिभा जी से पूछा गया कि यह काम कैसे संभव हुआ इस मंदी के दौर में तो वे सहजता से कहती है कि इन तीन सालो में वे और अर्शिया लोगो तक शायद ये बात पहुचने में सफल हुए है कि वे भारत को विश्व के संस्कृतिक- कैलेंडर में स्थापित करना चाहते है. आगे प्रतिभा जी कहती है कि एक बार अगर कोई अपने मन से अहम् निकल कर काम के प्रति समर्पित हो जाये तो सरकार, नौकरशाह,उद्योगपति , सीइओ ,स्वयंसेवक,सहयोगी सभी आपके लिए काम करने के लिए तात्पर्य हो जायेगे.

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

कुछ अनसुनी कहानिया ".-( बिछड़े दोस्त)

गतांक से आगे :- बिछड़े दोस्त



चलिए अब आपको कहानी की मुख्य धारा पर ले चलते है . ये है रमा. रमा की उम्र ६१ वर्ष आईने के सामने खड़े होकर वह अपने उम्र की रेखाओ को कम थोडा कम करने के लिए एंटी एजींग क्रीम लगा रही है . खास बॉम्बे से मगवया है उसने १५०० रुपये खर्च कर के . फिर तरह - तरह की क्रीम , लोशन ,हेज्लिंग , पावडर रमा के ड्रेससिंगतबल पर बिखरे पड़े है जिसका इस्तेमाल करके वो अपने सौन्दर्य अभियान में अपने आप को थोडा सा संतुष्ट पा रही है . आब आप कहे गे इस उम्र में इतने सजने - सवारने की क्या जरूरत . कोई पुरुष तो उसे इस उम्र में " वैसे " देखेगा नहीं ----------, ऐसा मेरा नहीं , रमा का मानना है .

मै यहाँ अपनी कोई भी बात या विचार या सोच नहीं रखूगी . बस आप लोगो को इन महिलाओ के जीवन - प्रवाह से परिचित करवाउंगी. समय के साथ - साथ समाज के हर भाग में बदलाव आया है . सही या गलत - ये मै नहीं जानती.
हां , तो रमा आज कोलकाता आयी है . वैसे वो रहती मुंबई में है . आज उसका कारोबार हिमांचल में है - टिम्बर का . पर कभी - कभी कोलकाता आती रहती है. यहाँ उसका एक पूर्व प्रेमी रहता है ,उसी से मिलने वो चली आती है बीच- बीच में . अब आप कहेगे इतने रुपये उसके पास कहाँ से आये खर्चने के लिए ? क्या उसके घर में कोई उसे मना नहीं करता इन सब चीजो के लिए? तो मै आपकी जानकारी के लिए कह दू कि रमा का कोई नहीं है इस दुनिया में . परिवार के नाम पर वो खुद एक इकाई है , पहली और आखिरी . रमा ने अपनी युवावस्था में एक बहुत ही पैसे वाले बूढ़े आदमी के साथ शादी कर ली . उस आदमी ने अस्सी वर्ष की आयु में मरते वक्त अपनी तमाम जायदाद रमा के नाम कर दी और वयवसाय भी .

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

आज से आप लोगो को अपने लिखे उपन्यास की सैर कर करवाने ले जाती हूँ . उपन्यास का नाम है - " कुछ अनसुनी कहानिया ". ये तीन औरतो की कहानी है....
- बिछड़े दोस्त -

दोस्तों आपलोगों को एक कहानी सुनानी है . कहानी है तीन औरतो की . अब आप कहेगे औरत ही क्यों ? मर्दों की क्यों नहीं ? तो बात यह है कि
यह मेरा पहला उपन्यास है , मै खुद एक महिला हूँ . फिर समाज के हर वर्ग का व्यक्ति औरतो में दिलचस्पी ज्यादा लेते है . फिर चाहे वह आदमी हो , मीडिया हो , सरकार हो, विपक्ष हो , अन्दर के लोग हो या बाहर के लोग . खुद औरते भी आज -कल अपने आप में दिलचस्पी लेने लगी है. इसलिए आज- कल नित नए महिला विचार - विमर्श का आयोजन होता है और पुरुषो के साथ- साथ स्त्रीयां भी इसमें कंधे से कन्धा मिला कर भाग लेती है .
ऐसा है कि ये कहानी तीन प्रोढ़ावस्था को पार कर चुकी औरतो की है. ( उनेह न कहिये गा वर्ना वो खफा हो जाये गी वे तो अभी भी खुद को युवाओ से ज्यादा युवा समझती है ) समाज की नजरो में इन साठ वर्ष की औरतो के जीवन में कुछ खास नहीं बचा है , पर ये मानती है कि इनके जीवन में अभी ही तो स्थायित्व आया है जब वो बैठ कर अपने संघर्षमय जीवन का आनंद ले सकेगी .

क्रमश :

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

एक चेतावनी -सावधान

अगले सप्ताह से मै आप लोगो को एक उपन्यास पढ़वाने ले जा रही हु क्या करे ढूढ़- ढूढ़ कर प्रकाशक नहीं मिला तो ब्लॉग पर ही प्रकाशित करने का सोच लिया . अब आप लोग बर्दाश करने के लिए तैयार हो जाये.
धन्यवाद्

बेटी बनाना

बेटी बनाना एक ऐसा काम है जहाँ दायित्वा तो है पर दायित्व के साथ अधिकार नहीं है. बेटिया घर की इज्ज़त होती है , घर के अन्दर का सारा काम संभालती है, घर के बहार कैसे रहे, कैसे चले कि घरवालो की इज्ज़त बरक़रार रहे ये सब उसे सिखाया जाता है . घर पर आफत - विपत आने पर वे अपने गहने , नगदी, जमा - पूजी परिवार को सौप देती है. पर कभी प्रश्न नहीं कर सकती कि इन पैसो का क्या किया जाये गा? कभी परिवारवालों से नहीं मांग सकती कि आज उसे संपत्ति से कुछ चाहिए क्यों कि वो भी कुछ बनना चाहती है. ऐसा कर के वो परिवार की गरिमा को धक्का पहुचती है .
ऐसा सोच आज भी हमारे समाज में मौजूद है. उसके बुरे वक़्त में उसके दिए हुए गहने- रुपये उसे नहीं मिल पाते . ये एक कटु सच्चाई है आज भी हमारे समाज की . बेटे अगर सम्पति में हिस्सा मांगे तो समझ में आता है समाज के ठेकेदरो को पर बेटी अगर हिस्सा मागे तो नहीं समझ में आता है उनेह .तब उनेह लगता है कि कही कुछ गड़बड़ हो रहा है. ये तो समाज के पढ़े- लिखे सम्पन्न तबके की बात हो गयी.
आज भी समाज के अति गरीब तबके में माँ- बाप बेटियो को बेच देते है अपनी थोड़ी सी गरीबी थोड़े देर के लिए मिटने के लिए. उनेह मालूम है कि वे किस दल- दल में अपनी बेटी को धकेल रहे है पर न सरकार इस दिशा में कोई कड़े कदम उठती है न कोई स्वयं सेवी संगठन इस दिशा में कोई ठोस करवाई कर रही है. स्वयं सेवी संगठन सिर्फ सेमिनार करने तक खुद को व्यस्त रख रही है. अपने बच्चो को बेच देनेवालों का बचाव सरकार - मीडिया उनके गरीबी का हवाला देकर अपराध को हल्का करने की कोशिश करती है , उनेह गरीब माता पिता का ख्याल आता है, उस मासूम बच्चे का नहीं जो अब नरक से भी बदतर जीवन जीने के लिए धकेल दिया जा रहा है. इस अपराध के ज्यादातर शिकार लडकिया ही होती है. फिर यौन शोषण का लम्बा दौर शुरू हो जाता है उनके लिए . क्या ये मुद्दे घरेलु हिंसा कानून का हिस्सा नहीं बनने चाहिए ? ये बच्चिया तो यह भी नहीं जानती कि उनका क्या हक और मानवीय अधिकार है ? इन चीजो के लिए उनेह जागृत कौन करे गा? अभी तो हमारा पूरा मीडिया- समाज फैशन और स्टाइल सिखाने के पीछे लगा पड़ा है युवाओ और जनता को अधिकार के लिए जागृत करने की फुर्सत उसे कहा है ? फिर इस सब से निचले तबके और पिछड़े समाज की तो उसे और भी चिंता नहीं है. अगर चिंता जाता भी दी जाती है कागजो पर तो उन तक कौन पहुचायेगा जिन तक ये पहुचना चाहिए.

ऐसा नहीं है कि स्थिति स्याह और बुरी ही है ,बहुत सी लडकियो के माता - पिता अपनी बेटियो के लिए अच्छी से अच्छी शिक्षा की व्यवस्था करते है और उनके बेहतर भविष्य की कल्पना करते है .पर अफ़सोस यह है कि ऐसे लोगो की संख्या समाज में कम है . आज भी लड़की को इस लिए पढाया जाता है कि उसके लिए एक अच्छा लड़का मिलजाए किसी तरह से , इस लिए नहीं कि लड़की का विकास हो , वो एक व्यक्ति की तरह उभर कर आये. उसे पहचान मिले.आज भी स्त्री की स्थिति शून्य इकाई की तरह है जिसकी कीमत वही होती है जिस इकाई के साथ वो जुड़ जाती है. माता -पिता को यही लगता है कि शादी के बाद ये बोझ रुपी बेटी दामाद के पास चली जाये . ६० - ७० के दशक में जब लडको ने अनपढ़ बीबी के बजाय पढ़ी - लिखी लडकियो को तरहीज देनी शुरू कर दी तो घरवाले दर से बेटियो को पढ़ने लगे कि दामाद घर पर बेटी को वापस न पटक जाये. तब से आज तक लडकियो की स्थिति में कोई बड़ा उलट फेर नहीं हुआ है , हा वे पढ़ी -लिखी जरूर हुई है ,हर क्षेत्र में उनकी उपस्थिति बढ़ी है पर स्थिति शायद वही है - आज भी उसे भोग्या समझा जाता है. व्यक्ति से वक्तित्व तक का उसका सफ़र बहुत ही कटीला है.
मेरे जीवन के एक दशक के पत्रकारिता के पेशेवराना अनुभव में कभी एक दिन भी ऐसा नहीं आया कि मैंने वरिष्ठ किसी वरिष्ठ किसी आईपीएस अधिकारीको समारोह बीच में छोड़ कर अपना चाय का जूठा ग्लास उठा कर डस्टबीन ढूढ कर डालते देखा हो . अगर बात यही तक होती तो सिर्फ आश्चर्य प्रगट कर के रह जाती ये लिखने नहीं बैठती. हुआ यू की हमारे महिला प्रेस क्लब का सालाना सांस्कृतिक कार्यक्रम था. मेरे परिचित एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी निमंतरण पर आये थे . मेहमान नवाजी का फ़र्ज़ निभाते हुए हमने उनसे चाय - काफी पूछी, तो उनोह ने चाय ली , हमने भी चाय ली. थोडी देर बाद हम दोनों का ग्लास खाली हो गया . आदतानुसार मैंने चाय का खाली ग्लास कुर्सी के किनारे रखदिया कि समारोह के बाद उठ कर डस्टबिन में दाल दूगी, तभी वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी डॉ. आदित्य आर्य ने मुझसे मेरा खाली ग्लास मागा. एक पल के लिए मै असमंजस में थी कि क्या करू . मेरे सोचते न सोचते उनोहो ने ग्लास मेरे हाथ से ले लिया और अपना ग्लास भी उठा कर कुर्सी से उठ पड़े , जब तक बात मेरे समझ में आती मेरे आखो के सामने से वो आगे निकल चुके थे और भीड़ में गुम हो गए . एक मिनट बाद मुझे लगा ये क्या हुआ , मैंने तब किसी को उनेह ढूढने के लिए भेजा, जब मेरा भेजा हुआ बन्दा वापस आया तो उसने मुझसे कहा - मैडम वो सिर्फ आप का नहीं बल्कि रस्ते में पड़े हुए खाली गिलासों को भी उठा कर डस्ट बीन में डाल रहे थे. मुझे समझ में नहीं आया कि मै क्या करू. अब मुझे लगा कि मुझे उठ ही जाना चाहिए और उनको ढूढ़ कर चेयर पर वापस बिठाना चाहिए. जैसे मै उठी सामने से डॉ. आदित्य आर्य को मुस्कुराते हुए आते देखा ,मेरी हट -भत बुद्धि को उस समय कुछ समझ में नहीं आया . एक तो वे मुझसे उम्र में काफी बड़े,फिर मेरे मेहमान . एक तरफ मुझे अन्दर से बहुत शर्मिंदगी मससूस हुई तो दूसरी तरफ उनके व्यक्तित्व के गौरवशाली मानवी पहलू से परिचित होने का अवसर भी मिला .
पूरे कार्यक्रम का आनंद ले कर जब वे जाने लगे तो मैंने गिलास एपिसोड के लिए उनसे मेरे तरफ से माफ़ी मांगी, तो उनोह ने कहा - आप तो छोटी बहन की तरह है. इसमें इतना क्या सोचा? इस बार फिर मै लाजवाव रह गयी. डॉ. आदित्य आर्य के बारे में मैंने उनके बैच मेट से काफी सुन रखा था कि वो बहुत धार्मिक और अध्यात्मिक किस्म के व्यक्ति है पर इतने मानवीय गुणों से भरे होगे ये नहीं पता था.
पर पूरे घटना क्रम से यह न समझ ले कि डॉ. आदित्य आर्य के अन्दर का पुलिस ढीला- ढाला है. जब मै उनेह वडाली बंधुओ से मिलवाने ले गयी तो फोटो खिचवाते वक़्त उनोहो ने सीधे तन कर खड़े होते हुए अपने कोटे का बटन लगते हुए कहा एक पुलिस अफसर को पुलिस अफसर दिखना भी चाहिए.
काश हमारे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी इतने मानवीय सम्बेदाना से भर जाये तो समाज में बहुत सारी समस्याए खुद-बा -खुद ख़तम हो जाये. उनको मिल कर मुझे दिल्ली पुलिस के एक आईपीएस अधिकारी के साथ का एक अनुभव याद हो आया , घटना यह थी कि मुझे एक आवेदन उनको जमा करना था , आवेदन पढ़ कर उनोह ने कहा कि इस पर आप पुनः साइन कर के अपना पता लिख दे. मेरे पास लाल रंगा की स्याही वाली पेन थी , सामने उनके पेनो का भरा स्टैंड देखकर मैंने उनसे कहा कि क्या मै काला या नीला पेन ले लू. मेरा प्रश्न सुनकर उनोह ने मुझे इस तरह देखा मानो कितना बड़ा जुर्म कर दिया हो मैंने. उसी दृष्टि से देखते हुए उनोह ने कहा - आपके पास जो पेन है उसी से साइन करदे . पहली बार मुझे लगा कि अछूतों को कैसा लगता होगा सबरनो के बीच में .