जागो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जागो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

पत्रकार से बेहतर दिल्ली सरकार के बस ड्राईवर

दिल्ली सरकार के बस ड्राईवरओ की शुरुआती तन्खावह पन्द्रह हज़ार रुपये होती है , फिर उसमे कुछ सेनिओर या बड़े वाहन से जुड़ा ALLOWANCE अगर मिला दिया जाये तो कुल मिला कर उनकी तन्खाव बीस हज़ार हो जाती है .
पर हमारे मीडिया में एक पढ़े - लिखे पत्रकार की शुरुआती तन्खावह क्या होगी ज्यादा से ज्यादा ५- १० -१५ हज़ार. इससे ज्यादा तो बिलकुल नहीं.
तो हुए न दिल्ली सरकार के बस ड्राईवर पत्रकार से बेहतर.
तो आगे से दिल्ली सरकार के बस ड्राईवर बनियो पर पत्रकार न बनियो.

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

टेनिस खिलाडी रुचिका गिरहोत्रा की दोस्त अनुराधा के नाम

हरियाणा पुलिस के पूर्व डी.जी.पी एस. पी. एस. राठोर को सजा मिलने के ठीक घंटे भर बाद जमानत मिलजाना हमारे न्याय- व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था की जो दयनीय तस्वीर पेश करती है उससे भविष्य के प्रति हमारा शंकालु होना स्वाभिविक है. .राठोर को टेनिस खिलाडी रुचिका गिरहोत्रा से १२ अगस्त १९९० में अश्लील हरकतों और आत्महत्या के लिये उकसाने के आरोप में ६ महीने की सजा हुई है. उस समय रुचिका गिरहोत्रा की उम्र केवल १४ साल थी.इंसाफ न मिलने से और घरवालो की लगातार परेशानी से परेशान होकर रुचिका गिरहोत्रा ने २९ दिसंबर १९९३ को मोत को गले लगा लिया था. ऊपर से यह दिखता है कि पीडिता को न्याय नहीं मिला , एक पुलिसवाले ने अपने रशूख का इस्तेमाल किया.
पर परत दर परत अगर इसे ध्यान से देखा जाये तो आप पाए गे कि अकेले राठोर के बस की बात नहीं थी रुचिका के परिवार के साथ गुंडागर्दी करके बच के निकाल जाने का. वो स्कूल क्या कम जिम्मेदार है जिसने रुचिका को निर्दोष जानते हुए भी उसे स्कूल से निकाल दिया ? उस स्कूल में पढनेवाले बच्चो के माता - पिता क्या कम दोषी है जिनोह ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई, जबकि मीडिया शुरू से रुचिका के साथ खड़ा था .अगर आज उनिह में से किसी अभिबवाक के बच्ची के साथ यह हुआ होता तो वे सारे समाज को कोसते .

अगर आम जनता और उसके स्कूल के साथी रुचिका को इंसाफ दिलवाने में जरा सी भी दिलचस्पी दिखलाते तो शायद यह केस इतना लम्बा नहीं खीचा होता. जब रुचिका की एक दोस्त का साहस आज राठोर को जेल हवा खिलवाने का परवान निकलवा सकता है तो ,उसके पूरे दोस्तों की मशकत कितना बड़ा परिणाम समाज के सामने रख जाती . राठोर जैसे लोग अपने -आप में अकेले कभी शक्तिशाली नहीं बन सकते, जब तक समाज चोर दरवाजे से इनके साथ न खड़ा हो . राठोर जैसे पुलिस वाले जानते है कि समाज के कई करता-धर्ता उनका मुखर विरोध कभी नहीं करेगे बल्कि चोर दरवाजे से उनसे अपने गलत कामो के लिए उल्टा और सहयोग लेने आयेगे .
दूसरा पहलू : राठोर जैसे लोगो को परिवारवालों का भी खूब सहयोग मिलजाता है जबकि रुचिका जैसे पीड़ित लोगो के परिवारवाले भी पूरे परिदृश्य से गायब होना या झुक जाना ज्यादा पसंद करते है .क्या राठोर की पत्नी और उसे जानने वालो ने उसका सामाजिक बहिष्कार किया ? उल्टा उनकी पत्नी कोर्ट रूम में उसके साथ खड़ी होकर उनके साथ होने का प्रमाण दे रही थी.क्या लोगो को राठोर को सामाजिक निमंत्रण सूची से बाहर निकला ? अगर न्याय के लिए यही हमारी प्रतिबधता है तो न्याय का यही हाल होगा और राठोड जैसे लोग तुरंत सजा के बाद जमानत पा कर हंसा करेगे . आरोपी को परिवार का सहयोग मिलने वाली बात सिर्फ राठोर के सन्दर्भ में ही नहीं और कई केस जैसे आर के शर्मा - शिवानी भटनागर , प्रियदर्शनी मट्टू, जेस्सिका लाल के केस में भी हम देखते है. धनञ्जय को फासी की सजा में उसकी पत्नी और उसका पूरा परिवार उसे निर्दोष साबित करने के लिए खड़ा था पर पीडिता /मृतिका के परिवार वालो का कुछ पता नहीं था .
आखिर में: इस पूरे परिदृश्य में महिला संगठनो का तो कुछ पता ही नहीं, उनके धरना- प्रदर्शन कहा गए ? और राष्ट्रीय महिला आयोग , राज्य महिला आयोग ? इनकी भूमिका तभी परदे पर आती है जब टीवी या मीडिया वाले इनको झझोरते है.
अंत में : बिना मीडिया की पैरवी के किसी को इंसाफ मिलना इस देश में इतना क्यों मुश्किल है?
माधवी श्री

संध्या और औरत होने की पीड़ा

बहुत अच्छा लिखा है संध्या ने या ये कहू कि महिला होने का कर्त्तव्य अदा किया है. बहुत पहले ये रिपोटिंग मैंने पढ़ी थी , जब मै कॉलेज में थी कोलकाता मै. यकीन मानिये वो रिपोर्टिंग आज भी मेरे दिमाग में उतनी ही ताजा है जितनी कि आज पढ़ कर. आप कह सकते है कि उस रिपोर्टिंग का HORROR आज भी मेरे दिमाग से नहीं गया है. मेरे ख्याल से किसी भी लड़की या स्त्री के दिमाग से नहीं जा सकता. ये रिपोर्टिंग उस समय KOLKATA 'S TELEGRAPH के WOMEN section में निकली थी . आज भी ये कहानी हर अख़बार में है छापी है वर्सो बाद . औरतो का दर्द सिर्फ खबर बन कर रह जाता है. जजों- वकीलों के लिए बहस का मुद्दा भर . सबूतों की तलाश में उसकी जिंदगी इंसाफ के लिए दम तोड़ देती है पर साबुत नहीं जुटा पाता है - न समाज न इंसाफ के पैरोकार . मजे की बात हैकि उनकी कहानी पिंकी जैसी अकेली महिला सामने लाती है , महिला संगठन का इसमें कोई रोल नहीं , वो तो कही बैठ कर" दान - चंदे " का मामला सुलझा रही होती है. वर्षो से औरत पर बलात्कार करना उसे काबू में या बदला लेने का माध्यम रहा है. इसलिए बलात्कारी को इतनी काम सजा नहीं दे कर छोड़ा जाना चाहिए. उसे एक हत्यारे से भी बड़ी सजा होनी चाहिए क्यों कि उसने जीते जी एक इन्सान की हत्या की है.
लिखना तो बहुत चाहती हूँ इस पर इसलिए नहीं कि ये मेरा पेशा है बल्कि मै सिद्दत से महसूस करती हूँ तभी लिख पाती हूँ . पर मै आज लिखने के बजाय आपको कुछ पढवाना चाहती हूँ. एक नयीलेखिका है , उसने भी बहुत सिद्दत से इस पर कुछ लिखा है. संध्या पेशे से विदेशी कंपनी में नौकरी करती है और किसी से प्रेम ( जो हर लड़की इस उम्र में करती है ....). आप उसके लिखे को जरूर पढ़े
http://jaanahaitaaroseaage.blogspot.com/

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

बेटी बनाना

बेटी बनाना एक ऐसा काम है जहाँ दायित्वा तो है पर दायित्व के साथ अधिकार नहीं है. बेटिया घर की इज्ज़त होती है , घर के अन्दर का सारा काम संभालती है, घर के बहार कैसे रहे, कैसे चले कि घरवालो की इज्ज़त बरक़रार रहे ये सब उसे सिखाया जाता है . घर पर आफत - विपत आने पर वे अपने गहने , नगदी, जमा - पूजी परिवार को सौप देती है. पर कभी प्रश्न नहीं कर सकती कि इन पैसो का क्या किया जाये गा? कभी परिवारवालों से नहीं मांग सकती कि आज उसे संपत्ति से कुछ चाहिए क्यों कि वो भी कुछ बनना चाहती है. ऐसा कर के वो परिवार की गरिमा को धक्का पहुचती है .
ऐसा सोच आज भी हमारे समाज में मौजूद है. उसके बुरे वक़्त में उसके दिए हुए गहने- रुपये उसे नहीं मिल पाते . ये एक कटु सच्चाई है आज भी हमारे समाज की . बेटे अगर सम्पति में हिस्सा मांगे तो समझ में आता है समाज के ठेकेदरो को पर बेटी अगर हिस्सा मागे तो नहीं समझ में आता है उनेह .तब उनेह लगता है कि कही कुछ गड़बड़ हो रहा है. ये तो समाज के पढ़े- लिखे सम्पन्न तबके की बात हो गयी.
आज भी समाज के अति गरीब तबके में माँ- बाप बेटियो को बेच देते है अपनी थोड़ी सी गरीबी थोड़े देर के लिए मिटने के लिए. उनेह मालूम है कि वे किस दल- दल में अपनी बेटी को धकेल रहे है पर न सरकार इस दिशा में कोई कड़े कदम उठती है न कोई स्वयं सेवी संगठन इस दिशा में कोई ठोस करवाई कर रही है. स्वयं सेवी संगठन सिर्फ सेमिनार करने तक खुद को व्यस्त रख रही है. अपने बच्चो को बेच देनेवालों का बचाव सरकार - मीडिया उनके गरीबी का हवाला देकर अपराध को हल्का करने की कोशिश करती है , उनेह गरीब माता पिता का ख्याल आता है, उस मासूम बच्चे का नहीं जो अब नरक से भी बदतर जीवन जीने के लिए धकेल दिया जा रहा है. इस अपराध के ज्यादातर शिकार लडकिया ही होती है. फिर यौन शोषण का लम्बा दौर शुरू हो जाता है उनके लिए . क्या ये मुद्दे घरेलु हिंसा कानून का हिस्सा नहीं बनने चाहिए ? ये बच्चिया तो यह भी नहीं जानती कि उनका क्या हक और मानवीय अधिकार है ? इन चीजो के लिए उनेह जागृत कौन करे गा? अभी तो हमारा पूरा मीडिया- समाज फैशन और स्टाइल सिखाने के पीछे लगा पड़ा है युवाओ और जनता को अधिकार के लिए जागृत करने की फुर्सत उसे कहा है ? फिर इस सब से निचले तबके और पिछड़े समाज की तो उसे और भी चिंता नहीं है. अगर चिंता जाता भी दी जाती है कागजो पर तो उन तक कौन पहुचायेगा जिन तक ये पहुचना चाहिए.

ऐसा नहीं है कि स्थिति स्याह और बुरी ही है ,बहुत सी लडकियो के माता - पिता अपनी बेटियो के लिए अच्छी से अच्छी शिक्षा की व्यवस्था करते है और उनके बेहतर भविष्य की कल्पना करते है .पर अफ़सोस यह है कि ऐसे लोगो की संख्या समाज में कम है . आज भी लड़की को इस लिए पढाया जाता है कि उसके लिए एक अच्छा लड़का मिलजाए किसी तरह से , इस लिए नहीं कि लड़की का विकास हो , वो एक व्यक्ति की तरह उभर कर आये. उसे पहचान मिले.आज भी स्त्री की स्थिति शून्य इकाई की तरह है जिसकी कीमत वही होती है जिस इकाई के साथ वो जुड़ जाती है. माता -पिता को यही लगता है कि शादी के बाद ये बोझ रुपी बेटी दामाद के पास चली जाये . ६० - ७० के दशक में जब लडको ने अनपढ़ बीबी के बजाय पढ़ी - लिखी लडकियो को तरहीज देनी शुरू कर दी तो घरवाले दर से बेटियो को पढ़ने लगे कि दामाद घर पर बेटी को वापस न पटक जाये. तब से आज तक लडकियो की स्थिति में कोई बड़ा उलट फेर नहीं हुआ है , हा वे पढ़ी -लिखी जरूर हुई है ,हर क्षेत्र में उनकी उपस्थिति बढ़ी है पर स्थिति शायद वही है - आज भी उसे भोग्या समझा जाता है. व्यक्ति से वक्तित्व तक का उसका सफ़र बहुत ही कटीला है.

सोमवार, 10 अगस्त 2009

लड़कियो की खरीद- फरोद सेक्स बाजार में

एक एनजीओ ने अभी एक प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया था जिसमे एक बच्ची को बांग्लादेश से छुड़ाया गया था और उसे उसके माँ -बाप को सौपा दिया गयाथा जो कि पंजाब के थे। ये प्रयास काबिले तारीफ है,पर सवाल उठता तक कि इतने सारे एनजीओ मिलकर कितना ,सुधर ला सके है। क्या मीडिया ने इस पर अब तक कोई खोज पूर्ण रपट बनाई है।अबतक कोई रिपोर्ट मीडिया में क्यो नही आयी किकितने रुपये इन एनजीओ को मिलते है और कितना ये अपने तामझाम में खर्च करते है और कितना ये उन मदों या कामो पर खर्चा करते है जिनके लिए उनेह ये मोटी रकम मिलती है। ये जो आकडे पेश करते है वो कितना विश्वसनीय है। अगर ये विश्वसनीय नही है तो इनकी बातें हम क्यो सुने? उनेह तवज्जो क्यो दे? एनजीओ एक बहुत बड़ा मध्यम है जनतंत्र में सुधार लाने का इसलिए इसे ढंग से मोनिटर करने की जरूरत है ।