"कहानी " फिल्म कई कारणों से लोगो के जहन में कई दिनों तक रहेगी. कुछ इसे विद्या बालन की एक्टिंग के कारण याद रखेगे, कुछ सुजोय घोष के निर्देशन के कारण , कुछ कोलकाता को नए सिरे से दर्शको के सामने पेश किये जाने के कारण याद करेगे . बहुत वर्षो के बाद कोलकाता को केंद्र में रख कर कोई फिल्म पूरी तरह से फिल्माई गई है. इस फिल्म के शुरुआत में कहानी जितनी सरल दिखती है दर्शको को , आगे बहते -बहते कहानी एक थ्रिलर बन जाती है. हर लम्हा कहानी का एक नया सिरा दर्शको के सामने खोलता है. कैसे एक साधारण सी लगने वाली एक कंप्यूटर इंजिनीयर गर्भवती स्त्री अंत में अपने पति की मौत का बदला लेनेवाली एक आर्मी ऑफिसर की विधवा निकलती है .यह दर्शको को अंत में चौका देता है .सिस्टम द्वारा इस्तेमाल होते होते सिस्टम को ही इस्तेमाल कर जानेवाली एक साधारण सी औरत की ये असाधारण कहानी है. विद्या बालन की दमदार एक्टिंग के कारण इस फिल्म को चलने में काफी मदद मिलेगी. पूरी फिल्म विद्या अपने कंधे पे ले कर चलती है. इस फिल्म में बंगाल के कलाकारों को दर्शको के सामने अपना हुनर दिखने का काफी मौका मिला. कोलकाता पुलिस अधिकारी की भूमिका में राना ( परमब्रता चटर्जी ) और बोब (सास्वत चटर्जी ) एक कांट्रेक्ट किलर की भूमिका में दर्शको के दिल में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गए है. एक बंगाली पुलिस बाबु की भूमिका को परमब्रता चटर्जी ने जिस सहजता के साथ निभाया है वह काबिले तारीफ है. बोब ने भी एक कांट्रेक्ट किलर की भूमिका को बिना किसी लाउडनेस के निभाया है उससे उसकी एक्टिंग क्षमता का परिचय तो मिलता ही है. साथ ही साथ दर्शको को एक नए तरह का किलर देखने को मिलता है जो आम हिंदी सिनेमा के क्रिमिनल से बहुत अलग है.निर्देशक सुजय घोष ने फिल्म के साथ काफी एक्सपेरिमेंट किया है जैसे बेकग्राउंड में बागला गानों का रेडियो में बजना , शूटिग नए कोलकाता की जगह पुराने कोलकाता में करना , दुर्गा पूजा को बेकग्राउंड में रख कर कहानी को आगे बढ़ाना सब कुछ एक शहर के मिजाज़ को ध्यान में रख कर किया गया है. ट्राम ,टैक्सी , रिक्शे का इस्तेमाल करना . विद्या बालन का राना को पाव मरना और राना का उसे नमस्कार करना ये कोलकाता की सभ्यता का एक महत्वापूर्ण अंग है जो अब ख़तम होता जा रहा है.
कुछ लोगो को विद्या और राना के बीच में पनपे हुए प्रेम को समझना अटपटा लगा हो. पर प्यार एक भावनात्मक निर्णय है और शादी एक प्रक्टिकल. हम किसी को उसके साहस , बुद्धिमानी और कोम्मित्त्मेंट के कारण भी प्यार कर सकते है. जरूरी नहीं है की प्यार किसी khoobsurat लड़की के साथ ही किया जाये जो अपनी बाली उम्र में हो. यह भी जरूरी नहीं है कि जिसे आप प्यार कर उसे बाहों में लेकर झूमे और पेड़ के आगे- पीछे चक्कर काटे . प्यार का मतलब चुप- चाप एक दूसरे की मदद करना भी हो सकता है बिना किसी शारीरिक प्रतिबधता के . इस फिल्म के बाद शायद इस विषय पर एक बहस छिड सकती है कि "आत्मिक प्रेम" जो आज के समाज बे एक outdated विषय बन गया है वो शायद इस फिल्म के बाद फिर से जीवित हो जाये. राना और विद्या का प्रेम भी कुछ इस तरफ दौड़ता नज़र आ ta है इस फिल्म में , तभी तो विद्या जब भाष्करण के खिलाफ सबूत छोड़ कर जाती है राना के नाम तब खान उसके इस कार्य को समझने में असफल रहता है. इंटेलीजेन्स अफसर ए खान की भूमिका में नवाज़ुद्दीन छा गए . एक काम से काम रखनेवाले इंटेलीजेन्स अफसर की भूमिका में खान जो एक गर्भवती औरत को भी अपना मकसद पूरा करने के लिए इस्तेमाल करने में जरा सा भी नहीं चूकता है और राना को सलाह देता है कि "प्यार अच्छी चीज है पर इसका इस्तेमाल सही जगह किया जाना चाहिए" नवाज़ुद्दीन हर जगह अपने कद से उचा दिखे .
गाना लोगो को पसंद आ रहा है चाहे वो "आमी सोत्ती बोल्ची " या " एकला चोलो रे " अभिताभ बच्चन की आवाज़ में लोगो को काफी पसंद आ रहा है. बिना किसी आइटम नंबर के या बिदेशी लोकेशन के यह फिल्म दर्शको को अपनी ओर खीच रहा है. कोलकाता की संस्कृति ,गालिओ और उसके मिजाज़ को समझने में यह फिल्म दर्शको को बहुत मदद करेगा . डर्टी पिक्चर, इश्किया और पा की सफलता के बाद यह फिल्म विद्या बालन को अग्रिम पंक्ति की हेरोइन में लाकर खड़ा कर के रख देगा . खाटी देशी लुक के साथ विद्या जो अपील रखती है उससे लगता है वो आज की माडर्न विदेशी लुक रखनेवाली हेरोइने को वो लबे समय के लिए टक्कर देगी आनेवाले दिनों में . "अल्लादीन "," होम डेलिवेरी" और झंकार बीट जैसी फिल्मो के बाद "कहानी" फिल्म की सफलता के बाद सुजय घोष को लम्बे समय तक के लिए याद किया जाये गा. विशाल -शेखर का संगीत जानदार है . कोलकाता के लिए भी लोग इसे वर्षो याद रखेगे .
माधवी श्री
film लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
film लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मंगलवार, 3 अप्रैल 2012
बुधवार, 1 फ़रवरी 2012
DIRTY PICTURE
फ्रायड ने कभी कहा था कि एक औरत की कीमत तब तक होती है जब तक वो एक आदमी की कल्पना को झंझोरती रहे . अगर इस बात को माना जाये तो कह सकते है विद्या बालन जो प्राय ४० के करीब होने जा रही है या सकारत्मक शब्दों में अपने ३० के अंतिम पड़ाव में है पूरे भारतवंशियो को अपने एक फिल्म से हिलाने की ताकत रखती है. सिल्क स्मिता से विद्या बालन तक फिल्म - समाज - दर्शक सब कुछ बदल चुका है.हेरोइएन की स्क्रीन लाइफ भी बढ़ गयी है. अपने उम्र के ३० के अंतिम दौर पर एश्वर्या राय बच्चन भी अपना दर्शक वर्ग रखती है और २० वर्ष की युवा हेरोइएनो को कड़ी टक्कर दे रही है. जो समाज सिल्क स्मिता के "बगावत" को सिर्फ अपने फायदे के लिए , दिल को सकून देनेवाला मान कर इस्तेमाल कर के छोड़ देता है , जिसकी माँ भी उसके मुहं पर दरवाजा बंद कर देती है. आज उसी " आज़ादी " के लिए लिए विद्या बालन की हर जगह तारीफ हो रही है , उसके पिता भी उसके साथ है, परिवार - फिल्म उद्योग का भी भरपूर साथ - सहयोग मिल रहा है उसे.
फिल्म के चयन के लिए एकता कपूर की जितनी तारीफ की जाये वो कम है. ये यकीन के साथ कहा जा सकता है कि अगर एकता ने इस फिल्म को प्रडूयूस नहीं किया होता तो शायद ये फिल्म इतनी चुस्त - दुरुस्त नहीं होती संबाद हो , या स्क्रीन प्ले हो, हेरोइएन का चयन हो . फिल्म के डायलोग इसकी जान है. शेर को सवा शेर की अंदाज़ में लिखा गया है. चाहे वो - दर्शक सामान देखती है दुकान नहीं, मेरे अलावा सब शरीफ है यहाँ, तुम रातो का वो राज हो ,जिसे दिन में कोई नहीं खोलता है,हमेशा से मर्दों का जमाना रहा है और औरतो ने आफत की है ,जब उपरवाला जिंदगी एक बार देता है तो दुबारा सोचना क्या, कुछ लोगो का नाम उसके काम से होता है , मेरा बदनाम हो कर हुआ.
इस फिल्म ने समाज के कई परतो को उधेडा है. सिल्क स्मिता का जन्म पर्दों पर पुरुष दर्शको के लिए हुआ था , पर वही दर्शक उसे " सी " ग्रेड की मानते थे. उस बेरहम फिल्म इंडस्ट्री में सिल्क का भला चाहनेवाले कुछ लोग मिल ही जाते है. उसका धूर विरोधी फिल्म डायरेक्टर इब्राहीम भी अंत में उसकी और उसकी फिलोसफी का कायल हो जाता है. इमरान हासमी ने इस किरदार को बहुत खूबी से निभाया है. क्यों जो समाज सिल्क की एक्टिंग को गन्दा मानता था , वही समाज रुपये खर्च करके उसे देखने जाता था बड़े शौक से. डारेक्टर से लेकर वितरक , पत्रकार , फिल्म उद्योग के सभी वर्ग जब उससे कमा रहे थे तो उसके कमाने के अंदाज़ को लेकर इतनी नैतिकता भरे सवाल क्यों उठाये जा रहे थे?
ये फिल्म अगर मै २० साल पहले देखी होती तो मेरी उम्र और उस समय के हिसाब से मेरे सोच में भी बहुत परिवर्तन होता. तब मै शायद इसे एक गन्दी फिल्म ही मानती . पर अब उम्र के साथ सोचने का तरीका बदल गया है. दुनिया को समझाने का एक नया अनुभव विकसित हुआ है. उसी हिसाब से सोचने और लिखने का तरीका भी बदल गया है. समाज , अति युवा वर्ग ने भी सोचने और जीने के मायने बदल दिए है. आज डर्टी पिक्चर उतनी डर्टी नहीं लगती है. फिल्म ने ८० के दशक की जीतेन्द्र और श्रीदेवी की फिल्मो की यादे ताजा कर दी. कलशे , मटके - लटके झटके , बप्पी दा की आवाज़ सभी मिल कर इस पिक्चर को एक नया लुक दे कर जाती है. सिल्क को अपनी कीमत मालूम था ,समाज के दोहरे मानदंड और खुद को कैसे इस्तेमाल कर के उचाई पर पहुचना पड़ता है ये भी. ये सब कुछ उसे वक़्त ने सीखा दिया , कुछ उसके अन्दर के आग ने. जिस तरह से सिल्क महिला पत्रकार से बदला लेती उसपर आपत्तिजनक लेख लिखने के लिए उससे उसके दबंग होने का असास तो होता है. और उसकी यही दबगाई उसकी दुश्मन पत्रकार को भी उसका कायल बना जाती है. सिल्क का बिंदासपन जहा उसे असमान तक पहुचता है वही बिंदासपन उसका दुश्मन भी हो जाता है. कहते है दाव तभी खेलना चाहिए जब आपके पास खोने को कुछ न हो , जब सब कुछ हो तो दाव नहीं खेलते. सिल्क इस बात को समझ नहीं पाई. वैसे भी उसे समझनेवाला कोई नहीं था उस वक़्त उसका अपना , आज फिल्म उद्योग में हेरोइनो के परिवारवाले बहुत सहयोगी हो गए है, चाहे वो नेहा धूपिया हो, विद्या बालन हो या कोई और .
फिल्म को मिलन लुथरिया के निर्देशन का पूरा लाभ मिला है .नशरूदीन शाह के साथ अपनी पहली फिल्म "इश्किया " का कम्फर्ट जोन
इस फिल्म में विद्या और नशरूदीन शाह के बीच पूरा दिख रहा था. तुषार कपूर ने भी इस फिल्म में अपनी छाप छोड़ी,इमरान हस्स्मी ने भी अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से जिया ज्यादा कर उस वक़्त जब वो कहता है - तुम ऐसी लड़की हो जिसे पीने के बाद पसंद किया जा सकता है, फिर आखिर में - शराब भी उतर गयी फिर भी तुम अच्छी लग रही हो. फिल्म में सिल्क का शिखर से गिरना और ख़तम होना सब कुछ बखूबी दिखाया गया है. उसके धुर विरोधी दुश्मन भी कैसे वक़्त के साथ उसके दोस्त बन जाते है. ये सब बाते हमारे जीवन का हिस्सा ही है. कुछ अलग नहीं....
माधवी श्री
फिल्म के चयन के लिए एकता कपूर की जितनी तारीफ की जाये वो कम है. ये यकीन के साथ कहा जा सकता है कि अगर एकता ने इस फिल्म को प्रडूयूस नहीं किया होता तो शायद ये फिल्म इतनी चुस्त - दुरुस्त नहीं होती संबाद हो , या स्क्रीन प्ले हो, हेरोइएन का चयन हो . फिल्म के डायलोग इसकी जान है. शेर को सवा शेर की अंदाज़ में लिखा गया है. चाहे वो - दर्शक सामान देखती है दुकान नहीं, मेरे अलावा सब शरीफ है यहाँ, तुम रातो का वो राज हो ,जिसे दिन में कोई नहीं खोलता है,हमेशा से मर्दों का जमाना रहा है और औरतो ने आफत की है ,जब उपरवाला जिंदगी एक बार देता है तो दुबारा सोचना क्या, कुछ लोगो का नाम उसके काम से होता है , मेरा बदनाम हो कर हुआ.
इस फिल्म ने समाज के कई परतो को उधेडा है. सिल्क स्मिता का जन्म पर्दों पर पुरुष दर्शको के लिए हुआ था , पर वही दर्शक उसे " सी " ग्रेड की मानते थे. उस बेरहम फिल्म इंडस्ट्री में सिल्क का भला चाहनेवाले कुछ लोग मिल ही जाते है. उसका धूर विरोधी फिल्म डायरेक्टर इब्राहीम भी अंत में उसकी और उसकी फिलोसफी का कायल हो जाता है. इमरान हासमी ने इस किरदार को बहुत खूबी से निभाया है. क्यों जो समाज सिल्क की एक्टिंग को गन्दा मानता था , वही समाज रुपये खर्च करके उसे देखने जाता था बड़े शौक से. डारेक्टर से लेकर वितरक , पत्रकार , फिल्म उद्योग के सभी वर्ग जब उससे कमा रहे थे तो उसके कमाने के अंदाज़ को लेकर इतनी नैतिकता भरे सवाल क्यों उठाये जा रहे थे?
ये फिल्म अगर मै २० साल पहले देखी होती तो मेरी उम्र और उस समय के हिसाब से मेरे सोच में भी बहुत परिवर्तन होता. तब मै शायद इसे एक गन्दी फिल्म ही मानती . पर अब उम्र के साथ सोचने का तरीका बदल गया है. दुनिया को समझाने का एक नया अनुभव विकसित हुआ है. उसी हिसाब से सोचने और लिखने का तरीका भी बदल गया है. समाज , अति युवा वर्ग ने भी सोचने और जीने के मायने बदल दिए है. आज डर्टी पिक्चर उतनी डर्टी नहीं लगती है. फिल्म ने ८० के दशक की जीतेन्द्र और श्रीदेवी की फिल्मो की यादे ताजा कर दी. कलशे , मटके - लटके झटके , बप्पी दा की आवाज़ सभी मिल कर इस पिक्चर को एक नया लुक दे कर जाती है. सिल्क को अपनी कीमत मालूम था ,समाज के दोहरे मानदंड और खुद को कैसे इस्तेमाल कर के उचाई पर पहुचना पड़ता है ये भी. ये सब कुछ उसे वक़्त ने सीखा दिया , कुछ उसके अन्दर के आग ने. जिस तरह से सिल्क महिला पत्रकार से बदला लेती उसपर आपत्तिजनक लेख लिखने के लिए उससे उसके दबंग होने का असास तो होता है. और उसकी यही दबगाई उसकी दुश्मन पत्रकार को भी उसका कायल बना जाती है. सिल्क का बिंदासपन जहा उसे असमान तक पहुचता है वही बिंदासपन उसका दुश्मन भी हो जाता है. कहते है दाव तभी खेलना चाहिए जब आपके पास खोने को कुछ न हो , जब सब कुछ हो तो दाव नहीं खेलते. सिल्क इस बात को समझ नहीं पाई. वैसे भी उसे समझनेवाला कोई नहीं था उस वक़्त उसका अपना , आज फिल्म उद्योग में हेरोइनो के परिवारवाले बहुत सहयोगी हो गए है, चाहे वो नेहा धूपिया हो, विद्या बालन हो या कोई और .
फिल्म को मिलन लुथरिया के निर्देशन का पूरा लाभ मिला है .नशरूदीन शाह के साथ अपनी पहली फिल्म "इश्किया " का कम्फर्ट जोन
इस फिल्म में विद्या और नशरूदीन शाह के बीच पूरा दिख रहा था. तुषार कपूर ने भी इस फिल्म में अपनी छाप छोड़ी,इमरान हस्स्मी ने भी अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से जिया ज्यादा कर उस वक़्त जब वो कहता है - तुम ऐसी लड़की हो जिसे पीने के बाद पसंद किया जा सकता है, फिर आखिर में - शराब भी उतर गयी फिर भी तुम अच्छी लग रही हो. फिल्म में सिल्क का शिखर से गिरना और ख़तम होना सब कुछ बखूबी दिखाया गया है. उसके धुर विरोधी दुश्मन भी कैसे वक़्त के साथ उसके दोस्त बन जाते है. ये सब बाते हमारे जीवन का हिस्सा ही है. कुछ अलग नहीं....
माधवी श्री
बुधवार, 16 सितंबर 2009
अप - यानि ऊपर : ऊपर की सैर
कल मैंने एक और पिक्चर देखी. पिक्चर "एनिमेटेड सिनेमा" थी. इस कारण लग रहा था कैसी होगी. पर जब देखी तो लगा इस सिनेमा में दो - तीन बाते जो हमे आम जीवन से जोड़ती है वो है हम सभी के अन्दर एक घुमक्कड़ आदमी रहता है जो वक़्त और जीवन की रोजमर्रा की जरूरतों के पीछे दौड़ - दौड़ कर थक जाता है. पर उसे अपने मन की मुराद पूरी करने की भी इच्छा रहती है .जब हमे मौका मिलता है तो हम उस मुराद को पूरी करने की कोशिश भी करते है.पर उम्र के ढलान पर यह जज्बा थोडा कमजोर हो जाता है. ऐसे समय पर जब हम किसी बच्चे से टकराते है तो उसका उत्साह हमे फिर से तरो- ताजा कर देता है. हम फिर से जीवन जीना शुरू कर देते है. छोटी सी मूवी में बहुत बड़ा सन्देश छिपा था. कभी- कभी छोटे बच्चे हमे ज्यादा कुछ सीखा देते है और गलत - स्वार्थ पूरण जीवन मूल्यों को वापस सही कर देते है .यह इस फिल्म में बहुत बेहतर तरीके से दिखाया गया है. मुझे एक बात खल रही थी - हमारी मुम्बैया फिल्म इंडस्ट्री ऐसी मूवी क्यों नहीं बनती जब कि ऐसे बहुत सारी कहानिया हमारे पास मौजूद है . हम बस नकलची की तरह नक़ल करते रहते है. बच्चो के लिए फिल्म डिविजन है पर वो बच्चो के लिए कितनी फिल्मे बनाते है? यह सिनेमा बच्चो को जितनी पसंद आयेगी बडो को भी उतनी ही पसंद आयेगी .बलून के सहारे पूरा घर लेकर उड़ना और हर नए चुनौतियो का मुकाबला करना इस फिल्म के खूबसूरत दृश्य है.
मंगलवार, 15 सितंबर 2009
ब्लू ओरंजेस " यानि - नीले संतरे .
कल एक फिल्म देखी " ब्लू ओरंजेस " यानि - नीले संतरे . ये फिल्म राजेश गांगुली की है. ये राजेश की पहली फिल्म है. राजेश ने ये अच्छा प्रयास किया है " कम बजट सिनेमा "में जो हमे "चस्मेबद्दुर", "नरम -गरम ", "गोलमाल " जैसी फिल्मो की याद दिला जाती है. हलाकि यह एक डिटेक्टिव फिल्म है पर आप पूरे तौर पर इस फिल्म से जुड़े रहते है शुरू से लेकर अंत तक. कुछ एक बात जो इस फिल्म का प्लस पॉइंट है और कमजोर भी. यह फिल्म कम बजट की फिल्म है और हमारी आँखों को बड़ी बजट की फिल्मो की आदत हो गयी है. दूसरी स्टार कास्ट में प्राय सब नए है सिर्फ राजित कपूर उर्फ़ ( ब्योमकेश बक्शी ) ;शिशिर शर्मा को छोड़ कर. नए आये कलाकारों में अहम् शर्मा काफी उम्मीद से भरे कलाकार लगे. अगर इस बन्दे को अच्छी फिल्मे मिलती है तो आने वाले दिनों में ये लम्बी रेस का घोड़ा होगा. पूजा कँवल "हम लोग " टीवी सीरियल की लजोजी (अनीता कँवल ) की बेटी है. पूजा की पहली फिल्म राजश्री प्रोडक्शन के साथ थी मुहब्बत वाले विषय पर जो बुरी तरह बॉक्स- ऑफिस पर पिटी. इस फिल्म में पूजा ने परिपक्व एक्टिग की है. देखे सितारे उसे कहा तक ले जाते है. कुल मिला कर मूवी एक अच्छी फिल्म बन पड़ी दिखाती है. जो टीवी सीरियल का सा अहसास देती है पर ये हमारी बड़ी बजट फिल्मो की आदत की खराबी है. फिल्म मल्टी- प्लेक्स या छोटे शहरो में चलनी चाहिए . अगर आप ये फिल्म देखे तो मुझे जरूर बताये कैसी लगी.
शनिवार, 12 सितंबर 2009
यह सिनेमा मैंने अभी हाल में देखी . वैसे इस सिनेमा मे कोई खास अलग बात नहीं है उन तमाम अंग्रेजी सिनेमाओ से जिनमे हर समय आदिम अस्तित्व पर खतरा मडराता रहता है. इसमें भी वही सब है पर बात जहा अलग सी दीख पड़ती है वो है इस फिल्म के माध्यम से यह बात दोहराई गई है कि अँधा धुन अगर हम मशीनीकरण कर लेगे अगर अपने जीवन का तो एक दिन मनुष्य का ही जीवन समाप्त हो जायेगा इस पृथिवी से .
इस फिल्म में वैज्ञानिक अपने मरने से पहले अपनी " मानवता " एक मशीन ९ में रख देता है जो बाद में मनुष्य की तरह ही हरकत करता है . वो बार - बार अपने साथियों को मुसीबत से निकलने के लिए अपने आप को खतरों में झोक देता है, वही उन का मुखिया सबको बचने के लिए सिर्फ छुप जाना पसंद करता है. वैसे ये कहानी बहुत हद तक मानवीय है पर पात्र सिर्फ मशीन है. कही -कही तो यही बात खलती है. और पात्रो का मानवीय होना ही हमे इस सिनेमा से बांधे रखता है. सभी पात्र आम इन्सान की तरह हरकत करते नज़र आते है चाहे वो एक दूसरे को डराने की कोशिश करते हुए या हावी होते हुए. मशीनी पात्रो के साथ ये फिल्म बहुत हद तक मानवीय है.


इस फिल्म में वैज्ञानिक अपने मरने से पहले अपनी " मानवता " एक मशीन ९ में रख देता है जो बाद में मनुष्य की तरह ही हरकत करता है . वो बार - बार अपने साथियों को मुसीबत से निकलने के लिए अपने आप को खतरों में झोक देता है, वही उन का मुखिया सबको बचने के लिए सिर्फ छुप जाना पसंद करता है. वैसे ये कहानी बहुत हद तक मानवीय है पर पात्र सिर्फ मशीन है. कही -कही तो यही बात खलती है. और पात्रो का मानवीय होना ही हमे इस सिनेमा से बांधे रखता है. सभी पात्र आम इन्सान की तरह हरकत करते नज़र आते है चाहे वो एक दूसरे को डराने की कोशिश करते हुए या हावी होते हुए. मशीनी पात्रो के साथ ये फिल्म बहुत हद तक मानवीय है.
सदस्यता लें
संदेश (Atom)