सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

चेहरा

इन चेहरों की भीड़ में अपने चेहरे की तलाश है मुझे
पता नहीं यही तो उतर कर रखा था कल टेबल पर
अपना चेहरा धोने के बाद साबुन से , नहीं फेसवाश से.
हडबड में गलती से किसी और का चेहरे को ओढ़ लिया था मैंने.
तब से अपना चेहरा ढूंढ़ रही हूँ मैं
इन चेहरों की भीड़ में !
(बहुत दिनों बाद आज लिखी एक कविता)

शनिवार, 8 जनवरी 2011

मै जो भी हूँ

मै जो भी हूँ
मुझे बनाया मेरे जनून ने .
मेरे रास्तो को मुश्किलों से
भरने वालो ने !
मुझ पर वार करने वालो ने .
मुझे मेरी मंजिल की कीमत समझाई
मेरे मंजिलो पर रोड़ा
अटकानेवालो ने .

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

व्यवस्था

व्यवस्था के दरवाजे पर पंहुचा एक आदमी
जो था व्यवस्था का शिकार -
व्यवस्थापक बन कर.
कुछ दिनों बाद खबर आई
वो आदमी व्यवस्था का शातिर शिकारी बन गया